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देहरी


है ये देहरी तुम्हारी, माना मैंने ।मेरी दीवार को भी है बांधा तुमने,

पर कैसे न कहूं, मुक्ति की चाह भीतुमने ही धरा है मुझमें।।

— हिमवान
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