एक ही जानिब मुल्क को लिए जा रहे थे धकेले।
पड़ा ज़रा जो बल विपरीत चटख गईं कितनी दरारें ।।
पता था खोद रहे हैं ज़मीन पांव के नीचे-नीचे ।
दावा था अर्जुन सरीखी निगाहें, बस आंखें मूंदे-मूंदे ।।
धारा तो इक थी बहती, पर कोई धार न थी ।
धुएं का गुबार था, पर कोई चिंगारी न थी ।।
ख़्वाबों को हक़ीक़त समझ बैठे, हसरत को ही मंज़िल ।
कल नहीं तो आज, आज नहीं तो कल कैसे हासिल ।।
कोरस भी ख़ूब उठा के रूह है कौम, और तन वतन ।
पर किसे था यक़ीन के होगा भरोसे का ऐसा पतन ।।
~ Himwan


