सीधी सी कोई बात, अब समझाऊँ मैं किसको

मेरी बात के, सबने, अपने मतलब निकाले हैं

 

जवाब मुंहतोड़ देंगे वो, आकर गिरेंगे जब 

आसमां पर जो हमने, पत्थर उछाले हैं 

 

कोई रिश्ता क्या चाहता है, इक समर्पण भाव ही 

तुम मेरे हवाले हो, हम तेरे हवाले हैं 

 

कहीं दंगा, कहीं हिंसा, कैसी जलन है ये 

किस बात की नफरत ने, इतने दिल उबाले हैं 

 

आज तो कोई अच्छी खबर होगी 

यही सोचकर हमने, कितने पेपर खंगाले हैं 

 

जहां पर जल रही हैं बस्तियां, वहीं पर अंधेरा है 

जो लगाकर आग आये हैं, उनके घर उजाले हैं 

 

चांद - मंगल पर पहुंचकर, क्या मिला हमको 

गरीब की थाली में, अब भी दो निवाले हैं 

 

सत्ता की गली में, दम तोड़ती खेती-किसानी भी 

हमारा पेट जो भरते, उनके पैरों में छाले हैं

 

खुशी के हैं थोड़े कम, गम के हैं ज्यादा 

हमारी आंखों ने जाने कितने आंसू संभाले हैं 

_Amit kumar Verma