तितलियों पे जब से पाबंदियां लगीं हैं
ये बाग भी देखो, वीरान हो गये हैं
दौलत और जिस्म बस, यही दो चाहतें बचीं
इश्क से तो सब, अंजान हो गये हैं
दो-चार दिन पहले मिली थी नौकरी, लेकिन
इस नौकरी से हम, परेशान हो गये हैं
घर भी जाने को अब है पूंछना पड़ता
छुट्टियों के कोई, मेहमान हो गये हैं
मर गईं हैं ख्वाहिशें और हजारों ख्वाब भी
पलकें-जिग़र दोनों, श्मशान हो गये हैं
कट रही है जिंदगी, क्या? जी रहे हैं हम
ढ़ो रहे खुद को, कोई सामान हो गये हैं
नाम करने की, क्या धुन चढ़ी सब पर
खुद से गुम हुये, गुमनाम हो गये हैं
जो सोचकर तुमको, कोई फर्क ना पड़ा
वही सोचकर हम, हैरान हो गये हैं...


