सूरज भी ढ़ल गया है, ये शाम ढ़लते - ढ़लते
थक सा गया हूँ मैं, तेरे साथ चलते - चलते
नींदों में शोर कितना, पलकों पे जोर इतना
कई ख्वाब मर गये हैं, आंखों में पलते - पलते
सींचा था जिसको हमने, उस बागे मुहब्बत में
कांटे निकल रहे हैं, फूलों के खिलते - खिलते
इन नज़दीकियों में थोड़ी, दूरी भी है जरूरी
हम बोर हो गये हैं, तुमसे रोज मिलते - मिलते