ख़ुदा ढूंढता हूँ ख़ुद में मगर
मुझसे होती नहीं है नकल आपकी
मैं हर नज़्म लिखता हूँ तुम-पर मगर
मुझसे बनती नहीं है गज़ल आपकी
रोज़ कूचे से तेरे गुजरना मेरा
रोज़ होती है मुझको फ़िकर आपकी
बेख़बर तेरे दर पर भटकता हूँ मैं
फ़िर भी रहती है मुझको खबर आपकी
बंजर दिलों पर जो आंसू गिरे
फ़िर तो उगने लगी है फसल आपकी
मैं जब भी लकीरों से आगे बढ़ा
मैनें कर दी है फ़िर तो पहल आपकी
हर रुख से पर्दा उठने लगा है
मुझको लगने लगी है नज़र आपकी
तुमने फेरीं निगाहें, अंधेरा हुआ
जैसे शामों-स़हर, हर पहर आपकी...