अजब से हैं ये लम्हे भी, गुज़र जायें तो अच्छा है
नकाबी हैं जो ये चेहरे, संवर जायें तो अच्छा है
जीते जी हमें मारा है जिन, अपने ही लोगों ने
उनके लिये...अब हम, मर जायें तो अच्छा है
ये जो हालात हैं बदतर, सुधर जायें तो अच्छा है
चौराहे पर खड़े हैं हम, किधर जायें? तो अच्छा है
जिनको हमारी आंखों को...पढ़ना नहीं आता
ऐसे लोग निगाहों से, उतर जायें तो अच्छा है
बनावट के हैं जो रिश्ते, बिखर जायें तो अच्छा है
भरोसे की चमक से सब, निखर जायें तो अच्छा है
हमारी छोड़कर जिनको...दुनियाभर की सुननी है
एेसे लोग अब हमसे, मुकर जायें तो अच्छा है ...