रातें हैं रो-रो के काटीं, आंसुओं को भी तुमने पिया है मुझको जीना नहीं इस कदर, जैसे घुट-घुट के तुमने जिया है कोख में ही अब तो मुझे..., मरने का जी करता है मां... मुझे.... जीने से डर लगता है   आंखों के ख्वाब मेरे, दुनिया ने खाक किये उड़ने को बेताब थी, पर, पर ही काट दिये तेरे आंचल से बाहर मुझे, निकलने से डर लगता है मां... मुझे.... जीने से डर लगता है   इंसानों ने हैवानियत की, हदें ही सारी मिटा दीं देवी मुझको ही माना, और मेरी ही बली चढ़ा दी इन झरोखों से बाहर मुझे, बस अंधेरा ही अब दिखता है मां... मुझे.... जीने से डर लगता है मां..... मुझे.... जीने से डर लगता है