दुनिया से हारा नहीं मैं
खुद से ही हारा हुआ हूँ...
जिंदगी मेरी ठहरा सा पानी
मैं तो खुद का किनारा हुआ हूँ...
मंजिलों पर नहीं है ठिकाना
हर सफ़र का सहारा हुआ हूँ...
शून्य से ही शुरू, शून्य पर ही खत़म
मैं तो सारा का सारा हुआ हूँ...
गैर कोई करम क्या करेगा
मैं तो अपनों का मारा हुआ हूँ...
अश्क आंखों में भरकर जो देखा
एक ओझल नज़ारा हुआ हूँ...
मीठे पानी से ख़ुद को भरा पर
मैं तो सागर सा खारा हुआ हूँ
शांत एकांत की गूंज ऐसी
की कहीं से पुकारा हुआ हूँ...
ना जाने कहाँ पर गिरूंगा
एक टूटा सा तारा हुआ हूँ...
मुझको अपनी पनाहों में ले ले
मैं तो फ़िर से तुम्हारा हुआ हूँ...
