
लहर के विपरीत जो हमने पतवार उठाई है
नाव डूबी समुंदर में किनारों की गवाही है
मैं कब की तोड़ देता ग़र मेरे नाम की होती
क्या करूँ? कसम भी तेरे नाम की खाई है
कभी जीते-कभी हारे तभी तो जान पाये हैं
रिश्त
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लहर के विपरीत जो हमने पतवार उठाई है
नाव डूबी समुंदर में किनारों की गवाही है
मैं कब की तोड़ देता ग़र मेरे नाम की होती
क्या करूँ? कसम भी तेरे नाम की खाई है
कभी जीते-कभी हारे तभी तो जान पाये हैं
रिश्त