लहर के विपरीत जो हमने पतवार उठाई है

नाव डूबी समुंदर में किनारों की गवाही है

 

मैं कब की तोड़ देता ग़र मेरे नाम की होती

क्या करूँ? कसम भी तेरे नाम की खाई है

 

कभी जीते-कभी हारे तभी तो जान पाये हैं

रिश्तों की लड़ाई में, हारे तो भलाई है

 

मंजिल और रस्ते में फ़रक इतना ही होता है

मंजिल घर खुद़ा का है, रस्ते में खुद़ाई है

 

किस्मत की लकीरें ये समझ मुझको नहीं आतीं 

ना जाने इन लकीरों पर किसकी लिखाई है...