जलते जंगल सा सारा जीवन हुआ है

व्यथा की कथा मैं कैसे सुनाऊं

और आंखों में पूरा समुंदर छुपा है

इक बूँद बाहर ला भी ना पाऊं...

हरियाली जो मुझमें हसने कि थी

जलती लपटों से वो राख होती रही

गिर के सूखे हुए पत्तों के जैसी

खुशियां मेरी खाक होती रहीं...

ना बची डाल अब ना डाल पर घोसला

झुलसा पंछी बेचारा गगन में चला

मेरे सपनों सी उसकी ख्वाहिश रही

मगर जब वो टूटा कभी ना मिला...

लताओं सी लिपटीं जो यादें जलीं

तना मेरे तन का झुलसने लगा

मेरे मन जैसा घायल जो कोई था

भाप बनकर दिशाओं में रिसने लगा...