दिन ढल रहा है, मेरी कीमत ग़िर रही है
सुबह से लगा हुआ बाजार हुई है 'जिंदगी'
जो भी मिला उसने मेरा दाम गढ़ दिया
इस तरह आजकल व्यापार हुई है 'जिंदगी'
दोस्ती, फ़रेब में मुझे अंतर नहीं मालूम
क्या अब-तलक बस बेकार हुई है 'जिंदगी'
ढ़ो रहा हूँ ना जाने कितने मुर्दा रिश्तों को
लगता है मासूमियत में बेगार हुई है 'जिंदगी'...