तुमको दिखता ही नहीं जब की, हकीकत क्या है तो फिर आंखों को रौशनी की, जरूरत क्या है   बिछा दो राह में किसी की, कि कुचल दे इनको तो फिर फूलों को महकने की, जरूरत क्या है   हमने देखा है, आंसुओं से, भीगते जहान् को तो फिर बादलों को बरसने की,जरूरत क्या है   यहां तो सब... जले जाते हैं एक-दूसरे से ही तो फिर इस आग को जलने की, जरूरत क्या है   पिघलता हो दिल किसी का, तो कोई बात हो फिजूल में, बर्फ़ के पिघलने की, जरूरत क्या है   यहां कोई किसी को समझता ही क्या है किसी नासमझ को समझने की, जरूरत क्या है   दुनिया से क्या मतलब, मुझको भरोसा है तो फिर अपनों को परखने की, जरूरत क्या है   अगर सीरत ही भली हो, देखने वाले की तो फिर सूरत को संवरने की, जरूरत क्या है   अब डर ही नहीं लगता ग़र अंधेरों से तो फिर सूरज को निकलने की जरूरत क्या है   आईने में मिला लेते हो अगर नज़रें खुद से तो फिर खुद को बदलने की, जरूरत क्या है...