नज़र दुनिया को ना आयें हमारी आँख के आंसू
हंसी होंठों पे रख-कर के बारिश़ में नहाऊँगा
बड़े अरसे से बरसे हैं नयन ये बोल अब इतने
मैं पलकों से निगाहों पर नहीं पर्दा गिराऊँगा
अंधेरों में लिखे थे गीत जो गम-शाद होने पर
भुनगा बनके लपटों पर उन्हें ही गुन-गुनाऊँगा
कभी टूटा, कभी लूटा, कई से आज तक रूठा
किसी के घर के खातिर मैं नहीं बस्ती जलाऊँगा
बहुत कुछ छोड़ कर आया दिलों के पास हूँ सबके
सिकंदर हूँ, मैं इक दिन जीत-कर के लौट जाऊँगा...