सफल स्वयं की नजर में बनिये

दुनिया तो बेगानी है

सबके मन में असफलता की

कोई न कोई कहानी है

आंख तक रही दुनिया-दारी

दिल को कोई शौक नहीं

बाहर बिखरी रेत पड़ी है

भीतर बहता पानी है

रोज दिखावा करते हैं हम

खुद पर कोई गौर नहीं

परछाईं बनकर चलती जो

वो सूरत अंजानी है

मंदिर-मस्जिद माथा रखकर

मांग रहे हैं जिसको हम

ढूंढा तो दिल में निकले वो

देखा तो हैरानी है

आंख तक रही दुनिया-दारी

दुनिया तो बेगानी है

बाहर बिखरी रेत पड़ी है

भीतर बहता पानी है...