कितनी चाह है मुझे,
कि किसी रोज़ उग आऊं मैं,
किसी अनचाहे पौधे जैसा,
तुम्हारे घर के आंगन में,
जहां तुम रोज़ बांटती हो जीवन
जैसे बंटती है ओंस की बूंदे फ़ूलों पर।।
कितना भरोसा है मुझे,
तुम्हारी दया पर,
कि अनचाहा होता हुआ भी,
तुम ना करोगी,
अपनी दया से वंचित,
और मैं भी हो पाऊँगा
तुम्हारा स्नेह कातर।।
कितनी सहज हो तुम,
तुम्हें परवाह नहीं,
कि कौन तुम्हारी चुपके से करुणा चुरा रहा,
कौन तुम्हारे बाग में इक मकां बना रहा।।
तुम तो लुटा देती हो,
हर रोज़ ही,
खाद-पानी अपने हिस्से का भी,
और मैं स्वार्थी सा,
बस बटोरने में जुट जाता हूँ।
जितना भी कर पाता हूँ।।


