तेरे नयन
तेरे नयनों के अंदर मुझको
सन्ताप दिखाई देता है
सूनापन सा दिखता है
आकाश दिखाई देता है।
इक पीड़ा सी है इसमें जो
खुद पीड़ित सी दिखती है
आशा की उम्मीद भी खुद
निराश दिखाई पड़ती है
प्रकाश किनारे खड़ा हुआ
अंधियारे से डरा हुआ
अपने भाग्य से हारा सा
हताश दिखाई देता है।
इक रात पड़ी है खोई सी
कुछ जागी और कुछ सोई सी
जैसे दर्द में वो कराह रही
अपनी नियति से निबाह रही
उसके अंदर कोई चाह नही
दिखती उसको कोई राह नही
क्यूँकि अपना सवेरा उसको
उदास दिखाई देता है।
थोड़ी नमी भी दिखती है
वो बंजर जमीं भी दिखती है
जो फूलों से महकती थी
कलरव से चहकती थी
वो देख रही नभ की ओर
कोई मेघ तो आए इस छोर
लेकिन उसको खाली सा
आकाश दिखाई देता है।
सन्नाटा सा इनके अंदर
जैसे कोई शांत समुंदर
जिसका है न कोई सिरा
अपने जल में स्वयं घिरा
सरिताओं को वह सहेजता
सारे अश्रु स्वयं समेटता
खारा होने पर भी उसमें
विश्वास दिखाई देता है।
खुद को भी इनमें पाता हूँ
मैं थोड़ा सा इतराता हूँ
जब आँसू भरेगा इनमे तो
प्रतिबिंब बनेगा इनमें जो
वो कुछ कुछ मेरा सा होगा
सावन का सवेरा सा होगा
एक पल के अश्रु में वर्षों का
वनवास दिखाई देता है।
........... अमित'केवल'
