तरसे जो बरसों इक गुलाब की खातिर,
कब्र पर गुल-दस्ते हज़ार मिले।
जीते जी एक यार मिला नहीं,
सांसें थमी तो पूरे जहाँ में दिलदार मिले।
- अज़ल


तरसे जो बरसों इक गुलाब की खातिर,
कब्र पर गुल-दस्ते हज़ार मिले।
जीते जी एक यार मिला नहीं,
सांसें थमी तो पूरे जहाँ में दिलदार मिले।
- अज़ल