इक वो मग़रूर लौटा नहीं,
और हम 'सर-ए-ऱाह' तकते रहे।
इक उम्र गुज़ारी तो एहसास हुआ,
'अज़ल' पत्थर को सज्दे करते रहे।
- अज़ल