इक नज़र जो देखा नूर उसका,

अब कोई अस्बाब, जन्नत नहीं लगती।

 

कुछ करम है उसकी दरगाह का,

दूरी--जन्नत भी दूर नहीं लगती।  

 

- अज़ल