दबे पाओं आकर कुछ यूं छू गया,

एक अरसे तक हम महकते रहे ।

 

लफ्ज़-ए-बयां के ना-क़ाबिल हुए,

तो उम्र भर बस चहकते रहे।

 

 

- अज़ल