मीडिया जिसे लोकतंत्र का चौथा स्तंभ माना जाता है, सामाजिक संप्रदायवाद एवं असहिष्णुता का एक प्रबल माध्यम बनता जा रहा है। यही मीडिया हर दिन तथ्यों को कुछ इस प्रकार से तोड़ मरोड़ कर प्रस्तुत कर रहा है कि यह किसी एक वर्ग विशेष पर आघात कर रहे हैं और सुप्रीम कोर्ट द्वारा मुहिम पर रोक लगाया जाना इसका एक उदाहरण है हालाँकि महामारी से संबंधित सावधानियों को भी ध्यान में रखकर सशर्त इसको आंशिक रूप से प्रतिबंधित कर सकते थे। यह न सिर्फ धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार पर अंकुश लगाता है, अपितु सांस्कृतिक एकता के पैमाने पर भी प्रश्नचिंह लगा देता है।


कहा जाता है कि यदि कोई झूठ सौ बार कहा जाए तो वह सत्य प्रतीत होने लगता है और यह मीडिया इस तथ्य का जमकर फायदा उठा रही है इसके साथ ही मीडिया भी इस सामाजिक व धार्मिक असहिष्णुता को तीव्रता से बल प्रदान कर रही है तनिष्क का विवादित विज्ञापन इसका ज्वलंत उदाहरण है अब प्रश्न यह उठता है कि क्या देश का एक प्रतिष्ठित प्रतिष्ठान इस धार्मिक कट्टरपंथ को बढ़ावा देगा? फिलहाल इसका निर्णय देश की जनता को लेना है क्योंकि हमारे संविधान ने भी अंतिम शक्ति आवाम के हाथों में ही सौंपी है। दूसरी ओर इसका निर्णय लेने से पहले यह आवश्यक है कि इस मुद्दे का मंथन जाति एवं धर्म से ऊपर उठकर होना चाहिए।


मीडिया व सामाजिक मीडिया के इस भ्रम जाल का सबसे अधिक प्रभाव देश की युवा पीढ़ी पर पड़ता है, अतः देश के युवाओं को इसके प्रति जागरूक होकर आत्म विश्लेषण से ही इन मुद्दों का निर्णय करना होगा। इसके अतिरिक्त युवाओं को सोशल मीडिया से ध्यान हटाकर हमारे पुरातन साहित्य पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए जैसे किताबें पढ़ना, कहानियां पढ़ना, एकांकी पढ़ना और देश के महान विशेषज्ञों के लेख इत्यादि।


अंततः हमारी युवा पीढ़ी ही इस भ्रम जाल को तोड़कर भारत देश की सामाजिक सांस्कृतिक वर्धा व धार्मिक एकता को सुनिश्चित कर सकती है..


~ अमित