जब तक न हुआ था बंटवारा
शब्दों में प्यार भरा था
सब पूछते थे, कैसे हो
कुछ खाया या नहीं
कुछ लाना तो नहीं है
बाज़ार जा रहे हैं
उस रोज़ मुझे याद है
जायदाद बंट रही थी
मुझे क्या इल्म था
वो झूठी मुहब्बत दिलों की
उस दस्तखत से मर रही थी ...

जब तक न हुआ था बंटवारा
शब्दों में प्यार भरा था
सब पूछते थे, कैसे हो
कुछ खाया या नहीं
कुछ लाना तो नहीं है
बाज़ार जा रहे हैं
उस रोज़ मुझे याद है
जायदाद बंट रही थी
मुझे क्या इल्म था
वो झूठी मुहब्बत दिलों की
उस दस्तखत से मर रही थी ...