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तेरा अक्स


हर मंज़र में तू ही तूहर शै में तेरा ही अक्स उतर आता है

कुछ कहते हैं भरम हैफकत मेरी आंखों का

मुझे उससे क्या गर दिल मेराइस भ्रम से ही बहल जाता है ...

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