सबकी प्यास बुझाता था कभी
अब सूखा कुंआ हो गया हूं मैं
अब कोई अपनी गगरी भरने नहीं आता
पूजा का एक बताशा भी कोई
शायद भूल से ही है रख जाता
कुछ बच्चे पत्थर फेंक देते हैं
कोई कूूड़ा बेकार सामान फेंक जाता है
अब तो ये कुंआ भी बारिश के पानी से
अपनी प्यास बुझाता है ...


