ये सिलवटें सी कैसी मिरे कफ़न पे,
किसने देखा है चेहरा इसे उठा के,
क्या वही थे वो जो आये थे रुख पे पर्दा गिरा के,
आज भी ना तोड़ी कसम उनने,
आज भी शायद डर था उनको यही,
कि ले ना जाऊं मैं,
इन बन्द आंखों से ही,
तस्वीर उनकी उनसे चुरा के ...

ये सिलवटें सी कैसी मिरे कफ़न पे,
किसने देखा है चेहरा इसे उठा के,
क्या वही थे वो जो आये थे रुख पे पर्दा गिरा के,
आज भी ना तोड़ी कसम उनने,
आज भी शायद डर था उनको यही,
कि ले ना जाऊं मैं,
इन बन्द आंखों से ही,
तस्वीर उनकी उनसे चुरा के ...