उम्मीद है सुबह ए मुहब्बत की मुझको,दीप इक आस का जलाए बैठा हूं,तिरे इंकार का डर है,मैं बहुत सहमा सहमा बैठा हूं ...
उम्मीद है सुबह ए मुहब्बत की मुझको,दीप इक आस का जलाए बैठा हूं,
तिरे इंकार का डर है,मैं बहुत सहमा सहमा बैठा हूं ...