बहुत धूल थी मेरे जज्बातों पे

कई रोज़ से दिल को कुरेदा नहीं था

थोड़ा मौसम सुहाना सा लगा तो

कल बैठा था शाम तनहा छत पे थोड़ी फुरसत से

हवाओं के साथ कहीं से 

इक झोंका उसकी याद का चला आया

सब धूल उड़ गई

उसे याद किया फिर रह रह के

बहुत रोना आया ...