ऐ बारिश काश तू कुछ समझदार होती

जहां होनी थी जितनी उतनी ही वहां होती

कब बरसना था कहां, वक़्त का पता होता तुझे कुछ

कुछ तुझे लोगों की जरूरत पता होती

फिर न मरता किसान कहीं सूखे से

न फिर मौत किसी की ये प्यास होती

मकां भी न ढहता कोई न कहीं जंगलों की आग होती

काश बस तू कुछ समझदार होती...