क़त्ल अब कर क्यूं नहीं देते

आंखों के काजल से

गालों की लाली से

कानों के झुमकों से

होंठों की मुस्कान से

पैरों की पायल से

बलखाती चाल से

अपने खुले बाल से

क्यूं सामान लिए मेरे क़त्ल का

यूं ही घूमते हो ...