हर मौसम में बेफिक्र हूं

सर्द सुबह हो, तपती दोपहर या बरसता दिन

मैं धरती की गोद में हर वक़्त बेहतर हूं

हल चलाऊं, बीज बोऊं, फसल उगाऊं

दिन रात खेतों पे पहरा दूं

फिर भी रोटी पेट भर, दो वक़्त की न कमाऊं

जो मिले सब कर्जे में ही फिर चुकाऊं

मगर पेट भर रहा है देश का

इस बात पे ही गीली आंखों से इतराऊं 

मैं रोता ही जाऊं मैं फिर भी मुस्कराऊं 

मैं किसान हूं किसी को क्या मैं मर भी जाऊं ....