शहर के बाहर
होती है, कम से कम
एक बस्ती
मलीन सी
जहां, कई आंखो में
पलती है
लाचारी व निराशा
भूख की तरह
और भूख मिटाने को
की जाती है मजदूरी,
उस कमाई से
खरीदी जाती है, शराब
और बहुत कम खाना
और एक छोटा सा समाज
जो है, कुपोषित, निरक्षर,
फटे कपड़ो से लिपटा,
बना रहता है, घाव की तरह
एक हिस्सा बनकर,
उसी शहर का,
उसी शहर के बाहर
- अमित 'तन्हा'


