सुबह , जो चली थी वहां से , अब शाम होकर लौटी है।

जो बात खास थी कभी, अब आम होकर लौटी है।

गुमनाम ज़माने में खोई थी कहीं जो , अब अंजाम होकर लौटी है।

खामोशी, रुसवाई, गहराई अब ये चीज ही क्या हैं,

इस रात की हर घड़ी, तेरे नाम होकर लौटी है।

क़यामत तो यह है कि कभी उन अधरों से स्पर्शित /जुल्फों से छलकी हर बूंद, अब ज़ाम होकर लौटी है।

सुबह जो चली थी वहां से, अब शाम होकर लौटी है।