तपती धूप में ठंडी छाँव सी तुम्हारी,

यूं बिखरी हैं ज़ुल्फें कि “उफ”,

सुरमई शाम की लालिमा सी तुम्हारी,

इन लबों की शोखी कि “उफ”,

शांत-शीतल किसी झील सी तुम्हारी,

इन आँखों की गहराई कि “उफ”,

मंद-मंद बहती हवा सी तुम्हारी,

ये मीठी सी मुस्कान कि “उफ”,

झुकती-उठती घटाओं सी तुम्हारी,

ये चंचल सी निगाहें कि “उफ”,

पल-पल निखरती कुदरत सी तुम्हारी,

रुख़सार की रंगत कि “उफ”।


कवि-अंबर श्रीवास्तव।