टूथ ब्रश को मुँह में ठूसे हुए मेरी सुबह आँखे मल रही थी पड़ोस के कुकर की सिसकियाँ अब रेडियो पर हावी हो रही थी चाय आज फिर ज़्यादा उबल गई अख़बार में फिर बकवास ही थी दफ़्तर के रास्ते में भीड़ थी धूप चार दिन से खिली नही थी बेतुके चुटकुले, खोखली हँसी मेज़ पर मक्खियाँ रेंग रही थी मैं चाय के बहाने निकल पड़ा पर तलब शराब की हो रही थी बेफिक्रे वो दिन मगर अब न थे दिन दिन नौकरियाँ छूट रही थी सिगरेट से काम चल सकता था पर उस की अभी आदत नही थी ठेले पर पकौड़े तल रहे थे और मुझे भूख भी लग रही थी जिस कागज़ की पुड़िया में बाँधे मेरे दफ़्तर की फ़ाइल ही थी बड़े दिनों बाद मैं मुस्कुराया दोपहर उजली सी लग रही थी