हम शान से जीते थे रुतबा था एक गज़ब ही हमारा, मित्र मंडली में जब सब बताशे लूटने में रहते हम अपनी पोथी में सिर खपाते सब आश्चर्य करते कि कैसे मैं ही बचा हूँ, बचा पाया हूँ अपने बगीचे को, इस बयार से। मैंने कोई मौका ही नहीं दिया था बाड़ लगाए रखी हमेशा ताकि बचा रहूँ मैं, रोगी बनने से अपने दोस्तों की तरह मधुवन में भटकने से, खो जाने से पर आज सुबह ही एक हवा का झोंका, उसी हवा का मेरे बगीचे से गुज़र गया और इस बगीचे की सब कलियाँ खिल गईं फूल बन गईं और अब मैं भी किसी के लिए गुलाब चुन रहा हूँ।