आग़ाज़ अगर तुझसे हो तो, अंजाम की परवाह क्यों करूँनामाबर अगर तू हो तो, ख़बर की परवाह क्यों करूँ ,डर लगता है कभी-कभी रह-गुज़र को देख कर,पर हमसफ़र अगर तू है तो मंज़िलों की परवाह क्यों करू,ँ
आग़ाज़ अगर तुझसे हो तो, अंजाम की परवाह क्यों करूँनामाबर अगर तू हो तो, ख़बर की परवाह क्यों करूँ ,डर लगता है कभी-कभी रह-गुज़र को देख कर,पर हमसफ़र अगर तू है तो मंज़िलों की परवाह क्यों करू
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