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जर्ज़र लोकतंत्र

सत्य-न्याय का शवदाह सम्पूर्ण,

असहाय, मजबूर, क्षत-विक्षत लोकतंत्र

करबद्ध नमन कल तक, आतंक गर्जित स्वर

अब काहे की जनता, और काहे का जनतंत्र।



हाँ कल तक, उफनाई गागर जोड़-जोड़ कर बूंद

आज हुआ असीम नीरनिधि, और बूंद रह गई बूंद

कृतघ्नता का नंगा नाँच किया, सत्ता के मतवालों ने

गाँधी का सपना तोड़ दिया, बाबर के रखवालों ने।



हाँ कल तक, षड्यंत्र विनय का अतिशय अनूप

आज, प्रतिक्षण परवर्तित विकट रूप-स्वरूप

बुझी आस की लौ, हाहाकार आतंक-गुंजित मुनादी

शर्म-विभोर, लज्जित सर, बड़ी भयावह यह आजादी ।



हाँ कल तक, स्वर्ण मृग प्रलोभन अति-विचित्र

आज, निराधार मृगतृष्णा रचित चल-चित्र

किन्तु अब राम-राम रह गया, अधर पर शेष

संत पीताम्बर फेंक, कुटी में घुस आया लंके
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