मैं अपने मयार से नीचे उतर भी सकता हूँ
तुम्हारे प्यार में हद से गुज़र भी सकता हूँ
क्यों हर रोज़ बनाते हो बहाने यूँ दूर जाने के,
इक दफ़ा प्यार से कहते तो मर भी सकता हूँ।
- अमर संदीप


मैं अपने मयार से नीचे उतर भी सकता हूँ
तुम्हारे प्यार में हद से गुज़र भी सकता हूँ
क्यों हर रोज़ बनाते हो बहाने यूँ दूर जाने के,
इक दफ़ा प्यार से कहते तो मर भी सकता हूँ।
- अमर संदीप