हम जिस कश्मकश में जी रहे हैं,कोई जी के तो बताए।

जिन्हें आग की तपन देखनी हो, वही मेरे करीब आये।


हर किसी का अपना मसला है, अपने जज़्बात हैं,

जरूरी नही इश्क़ तुमसे हो, और तुम्ही को दिखायें।


हम उसकी दिलकशी में जीते रहे,

जिसे मोहब्बत का सहूर नही मालूम,

कोई कायदा ऐसा बने,

कि इश्क़ से पहले जज़्बात सिखायें।


इक शख्स की तलबगार बनी रहे जिंदगी,

प्यार वो करे न करे, बस फ़ोन तो उठाये।


हमें जरूरत है, कोई अच्छी किस्मत दे सके,

जिसकी कीमत हम अगले जनम में चुकायें।।


~अमर_अल्फ़ाज़