तुम्हारे खुद से ही ताल्लुक नही अच्छे,

तो सच बताओ, ये बुलंदियाँ किस काम की।

कभी खुद के आपे से बाहर नही निकले,

जंजीर हो या सलाखें, ये पाबंदियां किस काम की।


मालिक बदलने से नौकरशाही नही बदलती,

गुमान की ऐसी आज़ादियाँ किस काम की।

ज़मीर भी अगर मेले में बेंच आये हो, फिर

खुलेआम हुई नीलामी की बरबादियाँ किस काम की।


अगर जुबानी वायदों से ही सब साथ रहते,

रिश्तेदारी में फिर शादियां किस काम की।

मेरी नज़रों से होकर एक नस्लें गुजरती हैं,

किसी एक की बढ़ती कुछ खामियां किस काम की।


इश्क़ एहसासों की रवानी है, हर एक के मुताबिक

फिर इश्क़ के नाम पर बिकती तख्तियां किस काम की।

हमें पार करना हो गर दरिया ,तैर कर ही,

फिर किनारे लाख खड़ी कश्तियाँ ,किस काम की।