बड़ी देर लगी समझने में पर 

हालात से अब कुछ वाक़िफ़ हु मैं 


मैं कर्ण के भाती सदा उपेक्षित

और कई दफ़ा अपमानित हु मैं


मैं श्री कृष्णा सा नहीं हु फिर भी 

जन्म से ही विस्थापित हु मैं 


ना उद्देश मैं जानू इस जीवन का 

ना आकाश मुख प्रतिपादित हु मैं 


मैं दुर्योधन सा घृणित कलंकित

पर शब्द बद्ध, छल विरहित हु मैं 


इस कलयुग के फंदे में फँसा हु 

तक्षक दंशीत परीक्षित हु मैं 


मैं अमर हु अश्वस्थामा जैसा

युगों युगों से श्रापित हु मैं