क्यू इँसा अब परेशान है

जो ख़तरे मै तेरी जान है 

कुछ शतकों से तूने जो है किया 

यह उसका ही परिणाम है 

क्यू इँसा अब परेशान है


सभी एक होके कभी चल ना सके 

कभी जात पात को कुचल ना सके 

अब रहो दूर एक दुजे से 

अब अछूत हर एक इन्सान है 

क्यू इँसा अब परेशान है


अब सड़के ख़ाली सारी है 

जब फैली ये महामारी है 

अब साँस ले रही धरा विमुक्त 

जब प्रदूषण पे विराम है 

क्यू इँसा अब परेशान है


प्रकृति को तूने क्या है दिया 

बस बर्बाद किया बर्बाद किया 

हर जीवित जीव जब चख ही लिया 

कर हलाहल भी प्रशान ये 

क्यू इँसा अब परेशान है


संकेत समय के समझ ज़रा 

ये चिन्ह प्रलय के उमज ज़रा 

तु जी रहा है किस भ्रम मै 

क्या तुझे अमरता का वरदान है ?

क्यू इँसा अब परेशान है

जब ख़तरे मै तेरी जान है