तुम मुझे माफ़ कर भी दो मगर मैं, नहीं दे पाऊँगा ख़ुद को माफी मरने तक।   अभी भी ज़िंदा हूँ मैं तुम्हें, महज़ एक मांस का लोथड़ा मानने वाली यह कुत्तई जीभ अभी भी कटी नहीं है अनगिनत बार तुम्हारा चीरहरण करने वाली ये दुःशासनी आँखें अभी भी फूटी नहीं हैं   अब अगर यह जीभ कट भी जाए ये आँखें फूट भी जाए तब भी मैं ज़िन्दा रहूँगा आखिर निर्लज्ज जो हूँ।   अपनी नीचता पर सभ्यता का मुलम्मा चढ़ाकर बेचता आया हूँ खुद को सदियों से।