धुंध की चादर तले घिरीे है राजधानी है प्रकोप बढा रहा दक्षिण में बरसता पानी, गाओं कुछ ऐसे भी हैं जो सूखे की चपेट में, रोटी को तरसते थे अब बूँद पानी नहीं है पेट में सांस लेने के लिए भी संघर्ष करना हर पहर है, हवा को कर रहा कड़वा मानव का घोला ये ज़हर है। कभी चिड़ियों की चहचहाट से भोर हुआ करती थी, सूरज की लालिमा तन मन छुआ करती थी, अब शोर है सबको जगाता वाहनों-कारखानों का, सूर्य भी देता है दर्शन ठंडों में मेहमानों सा। यही सूर्य गर्मी में फिर कुछ ऐसा सर चढ़ जाता है, फसलों की सिंचाई के पानी को भी तरसाता है। वाकिफ़ होते हुए भी सबसे आँखे मूंदे बैठे हैं, अपने कर्मों को भूल सब दोष समाज को देते हैं अब भी जो हम आप लगे रहे आरोप प्रत्यारोप में, खाक हो जाएगा सब कड़वी हवा के प्रकोप में।