मैं सोचूं हर पल ये की तुमसे बहतर कुछ कर जाऊं, मैं हर दम हर इंसा से आगे रहना चाहूँ। चैन नहीं मुझको पा के भी ये दो जहाँ, तृप्ति मेरे मन की आखिर सम्भव है कहाँ! हर सफलता पर तुम्हारी मैं झूठ ही मुस्काता हूँ, जो निराश तुम होते हो झूठे आंसू भी बहाता हूँ। जो सोचूं दो पल रुक के, अचरज मुझको ये होता है ये मानव मन मेरा कितने रिश्तों को पिरोता है। सच नहीं आता नज़र झूठ की बुनियाद है, वेदना रहित होता जा रहा सम्वाद है। होड़ एक दूसरे से जीवन का ढंग है बन गया, सन्तुुलित सा था जो जीवन आज एक जंग बन गया।