इस दिवाली भक्तों की कबूल दुआ हुई
दिल्ली फिर एक बार धुआं हुई।
नियम कायदे यहाँ कौन समझता है,
दीये नहीं पटाखे जलाने से धर्म झलकता है।
परंपरा का हवाला दे अतिशबाज़िया हज़ार हुई
दिल्ली फिर एक बार धुआं हुई।
प्रतिबन्ध लगाने वाला हिन्दू से पहले इंसान था,
इस अंधी साम्प्रदायिकता का न उसे भी अनुमान था!
फैसला उसका पक्ष में था सम्पूर्ण मानवजाति के,
दिल्ली वाले ज़िम्मेदार बने खुद अपनी बर्बादी के।
किसान भी कहाँ पीछे रहते अपनी फसलों को जलाने में
सियासी दांव खेल गए सब उनको दोषी ठहराने में।
तर्क देते हैं प्रदुषण रहता पूरे साल है
जश्न करना है ज़रूरी दिवाली बड़ा त्यौहार है।
और भी मज़हब है फिर क्यों हम अकेले ही सहें,
रोक उनपर भी लगाएं फिर ही हमसे कुछ कहें।
कौन समझाए इन्हें मुद्दा धर्म का ये न रहा,
बढ़ते बढ़ते ये प्रदूषण जान सबकी ले रहा,
बेतुखी बातों में ही हम आप उलझे रह गए,
राख हुई बुद्धि सामाजिक बस पशु ही रह गए।
धुंध की चादर तले फिर कितनी ही सुबह हुई
दिल्ली वालों के ही हाथों दिल्ली फिर धुआं हुई।