थीं जितनी भी ज़िद्दी गाँठें, सबको खोल देती है,
मौत पानियों में सुकूं की राख घोल देती है।
रहा अनाथ, बेसहारा जो ज़िन्दगी भर,
मौत उसे लकड़ी के दामन में भी गोद लेती है।
व्यस्त रहा करते थे वो जो मेरी खुशियों के समय,
मौत मेरी अब वही वक़्त के द्वार तोड़ देती है।
जितने भी तुम भाव बढ़ा लो अपने, ऐ ज़मीन,
मौत मुफ़्त में नाम मेरे ही दो गज जोड़ देती है।
अर्जुन ने चाहे उस पर बाणों की सेज बनायी हो,
मौत भीष्म पे फूलों की वर्षा को मोड़ देती है।
एक बार तो इसे गले लगाकर देखो तुम 'अमन',
मौत सुना है पहले दफे ही रिश्ते जोड़ लेती है।