चार दिन भी हुए नहीं ब्याह के उसको आए हुए
उसके नाम की चर्चा में हैं मनचले बौहराये हुए
बस्ती में चर्चा है काफी उसके लम्बे बालों की
लोग तारीफें कर रहे हैं उसके गोरे गालों की
पति प्रेम है उसका सच्चा, तन से है वो थोड़ा कच्चा
प्यास बदन की बुझा ना पाए, है अकल से पूरा बच्चा
तन की प्यास बुझाने को वो दिल ही दिल में व्याकुल है
उसके तन को पाने को गली के लुच्चे भी आतुर है
मांग भरी है उसकी लेकिन मांग कहाँ भर पाती है
अपने दिल का दुखड़ा अपने भावों से बतलाती है
चूड़ी, कंगन, मेहंदी ये सब बस श्रृंगार के साधन है
तन तो साफ़ है उसका लेकिन मन ना उसका पावन है
अपने कजरारी आँखों को जब भी वो मटकाती है
नुक्कड़ पर दीवानों की फिर भीड़ जमा हो जाती है
रोज सवेरे अपने छत पर कपडे वो सुखाती है
अपने तन के कपड़ो को वो खिड़की पर धर जाती है
ताम-झाम में समय बिताती देवर को ललचाती है
लाली, काजल, बिंदी, पायल सब उसको दिखलाती है
पति चाकरी गया नहीं की लीला में लग जाती है
अपने प्रेमी को फिर अपने शयन कक्ष तक लाती है
जहाँ न कोई सीमा मन की ना तन की मर्यादा है
“काम” का मेला वहाँ पर हरदम घर के मान से ज्यादा है
जिसका एक से मन न भरता कई और से नाता है
घर के बाहर कई नाम से उसको जाना जाता है
उसके कारण घर की गरिमा मिट्टी में मिल जाती है
लोगो के तानो बाने की गोलियां हरदम चलती है
पति का सिर भी उसके कारण शर्म से झुकता जाता है
अपने यारों में अब उसको “नामर्द” बुलाया जाता है
बदन साफ़ रखने के कारण तीन बार वो नहाती है
मंदिर जैसे घर को अपने कर्म से अशुद्ध कर जाती है
अपने तन पर पर पुरूष के स्पर्श के चाह जो रखती है
ऐसी नारी इस दुनियाँ में चरित्रहीन बताई जाती है
किंतु उसके इस व्यवहार मे उसकी भी क्या गलती है
प्यासे मन के आगे कहो कब मर्यादा की चलती है
सबका हक़ है अपने साथी से तन की खुशियां पाने का
किंतु बस क्युं स्त्री के सर है घर की मर्यादा निभाने का
पुरुष समाज मे स्त्री के मन की बात नहीं सुनी जाती है
जो है जैसा है जीवन अहै तेरा यही बात बताई जाते है
अगर पुरुष के हक़ है अपनी मन की चाह बताने का
तो फिर स्त्री को भी हक़ है अपनी हिस्से की खुशियां पाने का
