भरे समाज में चाहे जितनी भाषण की वाहवाही हो

चाहे जितने लोगों ने तुम्हारी पीठ थपथपाई हो


लेकिन जब कोई अपना, अपनी भाषा में तारीफ़ करे

तब ऐसा लगता है जैसे आशीष मेरे शीश धरे


राह से भटके राही को दामन नहीं मिलता

गैरों की बोली में अपनापन नहीं मिलता